स्टॉक के 10 महत्वपूर्ण फंडामेंटल इंडिकेटर / 10 Most Important Fundamental Indicators Of Stocks

स्टॉक के 10 महत्वपूर्ण फंडामेंटल इंडिकेटर (10 Most Important Fundamental Indicators Of Stocks)

आप अगर शेयर मार्केट में निवेश करते है तो आप यह शब्द Fundamental Indicators बहुत बार सुने है। किसी कंपनी या स्टॉक में निवेश करने के पहले हमें उस कंपनी या स्टॉक के शेयर का विश्लेषण (Analysis) अवश्य करना चाहिये।

स्टॉक का विश्लेषण (Analysis) आप दो तरीके से कर सकते है, (i) फंडामेंटल विश्लेषण (Fundamental Analysis), (ii) टेक्निकल विश्लेषण (Technical Analysis) इन दोनों विश्लेषण के अंतर्गत कई सारे अन्य तत्वों का विश्लेषण भी करना होता है।

आज हम लोग स्टॉक के विश्लेषण का पहला तरीका फंडामेंटल विश्लेषण (Fundamental Analysis) के 10 महत्वपूर्ण फंडामेंटल इंडिकेटर को समझेंगे। जिसके बाद आपको एक अच्छा स्टॉक या कंपनी के चयन में सरलता होगी।

शेयर बाज़ार में अपना निवेश प्रारंभ करने के पहले अवश्य पढ़े: निवेश शुरु करने के पहले यह 6 चीजें अवश्य करें (6 Things To Do Before You Start Investing)

मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization)

मार्केट कैपिटलाइजेशन या जिसे Market Cap के नाम से भी जाना जाता है। यह किसी कंपनी के मौजूदा वैल्यू (Value) को दर्शाता है। कंपनी का Market Cap भी उसके शेयर के वैल्यू (Value) के साथ-साथ बदलते रहता है।

किसी कंपनी के मार्केट कैपिटलाइजेशन को निकालने के लिए उसके मौजूदा शेयर प्राइस (Current Share Price) को उसके कुल शेयर (Total Number Of Share) से गुणा किया जाता है। किसी कंपनी के शेयर का मूल्य बढ़ता है, तो उस कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Cap) भी बढ़ता है।

उदाहरण: मान लेते है, कि कंपनी Myfino का मौजूदा शेयर प्राइस 200 रुपये है तथा कंपनी के कुल शेयर कि संख्या 10,000 है तो कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन 200×10000= 20 लाख रुपये होगी। इसका मतलब अगर आपको Myfino कंपनी खरीदनी है, तो आपको 20 लाख रुपये देने होंगे।

कमाई का मूल्य (Price to Earning Ratio)

कमाई का मूल्य या Price to Earning Ratio जिसे PE Ratio के नाम से जाना जाता है। यह Ratio आपको कोई भी कंपनी बाज़ार में कितनी महंगी या सस्ती बिक रही है यह समझने में सहायता करता है।

कोई भी कंपनी अपने शेयर धारकों को प्रति शेयर कितने रुपये कमाई (Income) कर के दे रहा है यह PE Ratio से ही पता चलता है। शेयर के मूल्य के तरह उस कंपनी का PE Ratio भी कंपनी के वित्तीय परिस्थिति के साथ बदलते रहता है।

PE Ratio को निम्नलिखित फार्मूला के द्वारा ज्ञात किया जा सकता है:

PE Ratio= प्रति शेयर बाज़ार मूल्य (Market Price Per Share) / प्रति शेयर आय (Earning Per Share)

उदाहरण: यदि ABC कंपनी के शेयर का मूल्य ₹100 है और यह कंपनी प्रति शेयर 5 रुपये का आय कर रही है, तो उस कंपनी का

PE Ratio: ₹100 / ₹5= ₹20 होगा।

कभी-कभी कंपनी का PE Ratio उस कंपनी के भविष्य कि Performance के आधार पर भी होता है, अतः आपको अभी कंपनी का PE Ratio देख कर कंपनी महंगी या सस्ती लग सकती है परन्तु जब भविष्य में कंपनी के वित्तीय परिस्थिति बदलेगी तब उस समय PE Ratio कंपनी के Performance को पहले से ही Adjust कर लिया होगा। आपको किसी कंपनी में निवेश करने से पहले PE Ratio के साथ-साथ कंपनी के अन्य Ratio और Fundamentals को अच्छे से समझना चाहिये।

प्रति शेयर आय (Earning Per Share Ratio)

प्रति शेयर आय या EPS आपको यह जानकारी देता है कि कंपनी अपने शेयर धारकों को उसके एक शेयर के बदले कितना रुपये कमाई या आय कर के दे रहा है। कंपनी का प्रति शेयर आय (EPS) जितना अधिक होगा वह उस कंपनी के लिए उतना ही अच्छा माना जाता है।

निम्नलिखित फार्मूला से आप किसी भी कंपनी का प्रति शेयर आय अनुपात (EPS) निकाल सकते है:

Earning Per Share= कर के बाद कंपनी का शुद्ध आय (Net Income after Tax) / कंपनी के बकाया शेयरों कि संख्या (Number of Common Outstanding Shares)

उपयुक्त फार्मूला से आप किसी कंपनी का बुनियादी प्रति शेयर आय (Basic EPS) पता कर सकते है परन्तु EPS को और भी शुद्ध किया जा सकता है जिसे पतला प्रति शेयर आय या Diluted EPS कहते है।

पतला प्रति शेयर आय (Diluted EPS) का फार्मूला निम्नलिखित है:

Diluted Earning Per Share= कर के बाद कंपनी का शुद्ध आय (Net Income after Tax) – पसंदीदा लाभांश (Dividend) / कंपनी के बकाया शेयरों कि संख्या (Number of Common Outstanding Shares)

उदाहरण: XYZ Ltd. कंपनी का शुद्ध आय टैक्स देने के बाद ₹5000 है तथा कंपनी के बकाया शेयरों कि संख्या 1000 है और कंपनी ने अपने शेयर धारकों को ₹500 पसंदीदा लाभांश (Dividend) के रूप में दिये है तो इस कंपनी का EPS निम्नलिखित तरीके से ज्ञात किया जा सकता है:

Earning Per Share: ₹5000 / 1000 = ₹5/-

Diluted Earning Per Share: (₹5000-₹500) / 1000 = ₹4.5/-

किसी भी कंपनी कि EPS कि तुलना आपको उसी उद्योग (Industry) के कंपनी के साथ करनी चाहिये। EPS एक महत्वपूर्ण Ratio है जो आपको कंपनी के पिछले वित्तीय परिस्थिति के साथ ही भविष्य कि प्रदर्शन को अनुमानित करने में सहायता करता है।

शेयर बाज़ार में की जाने वाले गलतियों से बचने के लिए पढ़े: शेयर बाज़ार कि गलतियां / Mistakes in Share Market

उद्योग कमाई मूल्य (Industry Price to Earning Ratio)

उद्योग कमाई मूल्य (Industry PE) किसी भी उद्योग या सेक्टर के सभी कंपनियों के औसत कमाई के मूल्य (Price to Earning) को दर्शाता है।

यदि किसी कंपनी का PE Ratio उसके Industry PE Ratio से अधिक है तो सामान्यता आप यह मान सकते है कि वह कंपनी अभी अधिक Valuation पर है और उसमें बाद में निवेश किया जा सकता है।

ठीक इसके विपरीत यदि किसी कंपनी का शेयर का PE Ratio उसके Industry PE Ratio से कम पर ट्रेड कर रही है तो उसमें निवेश करने का यह एक सही मौका हो सकता है।

आपको कंपनी के PE Ratio और उसके Industry PE Ratio के साथ तुलना करके एक अनुमान मिलता है कि शेयर का बाज़ार में मूल्य महंगा है या सस्ता। परन्तु आप सिर्फ इसी को देख के कंपनी का सटीक मूल्यांकन नहीं कर सकते है इसके साथ ही आपको अन्य  Ratios और तत्वों को समझने कि आवश्यकता है।

कम PE Ratio वाले कंपनी में कई प्रकार के बुनियादी (Fundamental) या वित्तीय (Financial) समस्या हो सकती है जिसके कारण उस कंपनी का PE Ratio हमेशा कम रहता है। इसके विपरीत किसी कंपनी का PE Ratio उसके Industry PE Ratio से अधिक होता है तो यह हो सकता है कि वह कंपनी भविष्य में अपने वर्तमान Profit को कई गुना बढ़ा सकती है।

अतः हम यह कह सकते है कि किसी कंपनी का PE Ratio उसके भविष्य के बुनियादी (Fundamental) और वित्तीय (Financial) परिस्थितियों को भी अनुमानित कर के रखती है।

अंकित मूल्य (Book Value)

अन्य Ratios या Fundamentals के साथ ही किसी कंपनी में निवेश करने से पहले आपको उस कंपनी के शेयर के अंकित मूल्य (Book Value) कि जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है।

कंपनी के कुल संपत्ति (Total Asset) को उसके कुल देनदारों (Total Liability) से घटा ने के बाद जो मूल्य आता है उसे ही उस कंपनी का Book Value कहा जाता है। यदि किसी कंपनी के पास अमूर्त संपत्ति (Intangible Asset) है तो उसे उसकी कुल देनदारियों (Total Liabilities) के साथ जोड़ दिया जाता है।

Book Value आपको यह भी दर्शाता है, यदि कोई कंपनी का परिसमापन (Liquidation) हो जाता है तो उसके शेयर धारक को प्रति शेयर कितना धनराशि मिलेगी।

यदि शेयर का बाज़ार मूल्य उसके Book Value से कम है तो उस कंपनी के शेयर को Under Value माना जाता। इसके विपरीत यदि किसी कंपनी का शेयर उसके Book Value से अधिक है तो उस शेयर को Over Value माना जाता है।

Book Value को निम्नलिखित तरीके से ज्ञात किया जाता है:

Book Value= कुल संपत्ति (Total Asset) – कुल देनदारियां (Total Liabilities)

Book Value यदि कंपनी के पास अमूर्त संपत्ति (Intangible Asset) हो तो:

Book Value= कुल संपत्ति (Total Asset) – कुल देनदारियां (Total Liabilities) – अमूर्त संपत्ति (Intangible Asset)

उदाहरण: ABC Limited एक कंपनी है जिसके Financial Report के अनुसार कंपनी के पास ₹50 करोड़ के Asset (संपत्ति) है तथा कंपनी के पास ₹25 करोड़ कि Liabilities (देनदारियां) है और ₹5 करोड़ कि अमूर्त संपत्ति (Intangible Asset) के रूप में कंपनी का Goodwill (ख्याति) है। इस आधार पर ABC Limited कंपनी का Book Value (बुक वैल्यू) निम्नलिखित है:

Book Value= ₹50 करोड़ – ₹25 करोड़ – ₹5 करोड़

Book Value= ₹20 करोड़

यदि ABC Limited कंपनी का बकाया शेयर कि संख्या 1 करोड़ है तो कंपनी का शेयर बुक वैल्यू Price to Book Value (प्रति शेयर बुक वैल्यू) ₹20 होगा (₹20 करोड़ / 1 करोड़)

उपयुक्त उदाहरण से हम यह कह सकते है कि यदि ABC Limited कंपनी का परिसमापन (Liquidation) हो जाता है तो उसके शेयर धारकों को प्रति शेयर ₹20 दिया जायेगा।

प्राइस टू बुक वैल्यू अनुपात (Price to Book Value Ratio)

Price to Book Value Ratio किसी कंपनी के मूल्यांकन करने के लिए एक महत्वपूर्ण अनुपात है। Price to Book Value Ratio या PB Ratio को समझने के लिए आपको पहले Book Value को समझना अति आवश्यक है जो कि ऊपर दिया गया है। PB Ratio आपको यह दर्शाता है कि कंपनी का शेयर बाज़ार में महंगा है या सस्ता है।

PB Ratio (Price to Book Value Ratio) को निकालने के लिए कंपनी के शेयर के वर्तमान Market Value को उसके Book Value से भाग दिया जाता है। किसी कंपनी का Market Value समय-समय पर बदल सकता है परन्तु उसका Book Value स्थिर रहता है।

PB Ratio (Price to Book Value Ratio) के सहायता से यदि आप किसी दो या उससे अधिक कंपनियों के शेयर को तुलना करना चाहते है तो आपको हमेशा एक सामान (Same) Industry के शेयर कि तुलना करना चाहिये। उदाहरण के लिए यदि आप किसी IT कंपनी का PB Ratio कि तुलना करना चाहते है तो आपको IT Sector के ही कंपनी कि तुलना करना चाहिये।

Price to Book Value Ratio (पी/बी अनुपात) को निम्नलिखित तरीके से ज्ञात किया जा सकता है:

Price to Book Value Ratio= शेयर का बाज़ार मूल्य (Market Value of Share) / शेयर का अंकित मूल्य (Book Value of Share)

उदाहरण: MRA Limited एक कंपनी है जिसके शेयर का मूल्य अभी शेयर बाज़ार में ₹225 है और कंपनी का Book Value ₹90 है तो MRA Limited कंपनी का Price to Book Value Ratio (पी/बी अनुपात) इस प्रकार ज्ञात किया जायेगा:

Price to Book Value Ratio= ₹225 / ₹90

PB अनुपात= 2.5 Times

उपयुक्त उदाहरण से आप यह कह सकते है कि MRA Limited का शेयर अभी बाज़ार में अपने बुक वैल्यू के तुलना में ढाई गुना पर मिल रहा है।

एक अच्छा या बुरा PB Ratio: प्रसिद्ध निवेशक बेंजामिन ग्राहम (Benjamin Graham) के अनुसार यदि कोई कंपनी का PB Ratio 1.5 Times के नीचे मिलता है तो इसे आप एक Undervalue शेयर मान सकते है और निवेश के लिए सही हो सकता है। परन्तु अभी के बाज़ार में 1.5 Times के PB Ratio पर आपको कोई भी अच्छी कंपनी नहीं मिलेगी और अगर आप को मिल भी जाता है तो हो सकता है वह कंपनी के Financial अच्छा नहीं होगा। सामान्य रूप से किसी भी शेयर का PB Ratio यदि 3 से अधिक है तो उसे व्यापक रूप से महंगा माना जाता है।

अतः यदि कोई शेयर का PB Ratio 1 से 2 के मध्य है और उसके अन्य बुनियादी (Fundamental) और वित्तीय (Financial) परिस्थितिया ठीक है तो निवेश के लिए सही मान सकते है।

इक्विटी पर रिटर्न (Return on Equity)

इक्विटी पर रिटर्न अनुपात या Return on Equity Ratio हमें यह समझने में सहायता करती है कि कंपनी शेयर धारकों के पैसो का सही से उपयोग करने में सक्षम है या नहीं। किसी कंपनी का Return on Equity (ROE) यह दर्शाता है कि वह अपने शेयर धारक के इक्विटी पर कितने प्रतिशत का रिटर्न देने में सफल हुआ है।

कंपनी का Return on Equity (ROE) जितना अधिक होता है, तो समझना चाहिये कि वह कंपनी अपने शेयर धारकों के पैसो/पूंजी को उतनी ही अच्छे तरह से उपयोग किया है। अतः कंपनी का इक्विटी पर रिटर्न (ROE) जितना अधिक होता है उस शेयर में निवेश करना भी उतना अच्छा माना जाता है।

इक्विटी पर रिटर्न अनुपात (Return on Equity Ratio) को ज्ञात करने के लिए कंपनी के वार्षिक शुद्ध आय (Annual Net Income) को कंपनी के कुल शेयर धारक इक्विटी (Shareholder’s Total Equity) से भाग दिया जाता है तथा इसे प्रतिशत (Percent) में देखने के लिए 100 से गुना किया जाता है। इसको आप निम्नलिखित फार्मूला से समझ सकते है:

Return on Equity= वार्षिक शुद्ध आय (Annual Net Income) / शेयर धारक इक्विटी (Shareholder’s Equity) * 100

उदाहरण: कंपनी XYZ Limited ने साल 2024 में ₹5 लाख का वार्षिक शुद्ध आय (Annual Net Income) अर्जित किया है और उसके कुल शेयर धारक इक्विटी (Shareholder’s Total Equity) कि संख्या 20 लाख है तो XYZ Limited का Return on Equity इस प्रकार होगा:

Return on Equity= ₹5,00,000 / 20,00,000 * 100

Return on Equity= 25%

उपयुक्त उदाहरण से हम यह कह सकते है कि XYZ Limited कंपनी अपने शेयर धारकों को उसके एक शेयर के मूल्य पर 25% का रिटर्न अर्जित कर के दे रही है अर्थात यदि XYZ Limited कंपनी का शेयर का बाज़ार मूल्य ₹175 है तो कंपनी उस शेयर धारक को प्रति शेयर ₹43.75 (₹175 का 25%) का रिटर्न दे रही है।

एक अच्छा या बुरा Return on Equity: अन्य अनुपातों के तरह हमें किसी भी कंपनी कि ROE कि तुलना उसी कंपनी के साथ करना चाहिये जिनका व्यापार का क्षेत्र (Sector) एक समान है।

सामान्यता यदि किसी कंपनी का Return on Equity (ROE) यदि 15-20% है तो उसे अच्छा माना जाता है और यदि किसी कंपनी का Return on Equity 25% से अधिक है तो उसे निवेश के लिए काफी आकर्षित माना जाता है।

यदि किसी कंपनी का Return on Equity 15% से कम है तो आप उसे बुरी कंपनी नहीं कह सकते है क्योंकि हो सकता है उस कंपनी का Return on Equity किसी बाहरी कारणवश कम हुआ हो और आने वाले सालो में वह कंपनी अच्छी ग्रोथ कर सकती है।

कोई भी एक निश्चित Return on Equity को अच्छा या बुरा नहीं कह सकता है क्योंकि कुछ Sector में 20% के ROE को बहुत अच्छा माना जाता है और कुछ Sector में 25% के ROE को भी कम आंका जाता है। परन्तु कोई कंपनी का Return on Equity यदि प्रति वर्ष निरंतर बढ़ रहा है तो उसे निवेश के लिए एक अच्छी कंपनी माना जा सकता है।

Monopoly कंपनी के जानकारी के लिए पढ़े: Monopoly Stock में निवेश करना सही है संक्षिप्त में समझे

अंकित मूल्य (Face Value)

अंकित मूल्य या Face Value वह मूल्य होता है जब कोई कंपनी बाज़ार में अपना IPO (Initial Public Offering) लाने के पहले या कंपनी के स्थापना (Startup) के समय निर्धारित करती है। Face Value को Nominal Value, Par Value या Intrinsic Value के नाम से भी जाना जाता है।

शेयर का बाज़ार मूल्य (Market Price) समय-समय पर बदलते रहता है परन्तु उसका अंकित मूल्य (Face Value) स्थिर रहता है। शेयर का Face Value कुछ निर्धारित समय पर ही बदलता है जैसे अगर कोई कंपनी अपने शेयर को विभाजित (Share Split) करता है।

उदाहरण के लिए ABC Limited के शेयर का Face Value ₹10 प्रति शेयर है और ABC Limited अपने शेयर को 1:1 के अनुपात में विभाजित (Split) करता है तो विभाजन के बाद Face Value ₹5 हो जायेगा।

अंकित मूल्य (Face Value) को निकालने के लिए इक्विटी शेयर पूंजी (Equity Share Capital) को उसके बकाया शेयरों कि संख्या (Number of Common Outstanding Shares) से भाग दिया जाता है।

उदाहरण: एक कंपनी ABC Limited कि स्थापना के लिए दो दोस्त Mr. A और Mr. B एक सामान पूंजी (Capital) ₹5,00,000 (यानि कुल पूंजी ₹10,00,000) लगाते है और बदले में उन्होंने कंपनी से ₹1,00,000 इक्विटी शेयर जारी किया है तो उनके शेयर का Face Value निम्नलिखित होगा:

Face Value= ₹10,00,000 / ₹10,00,00

Face Value= ₹10

IPO के समय Face Value द्वारा पता करें कंपनी का शेयर प्रीमियम:

ऊपर के उदाहरण को आगे बढ़ाते हुए मान लेते है, कि ABC Limited कुछ समय बाद शेयर बाज़ार में अपना IPO लाती है और अपने शेयर कि कीमत अपने Face Value से ज्यादा रखते है और यह कीमत ₹300 निर्धारित करते है तो आप यह कह सकते है कि ABC Limited अपना IPO ₹290 (₹300-₹10) के शेयर प्रीमियम पर ला रही है।

Dividend के समय अंकित मूल्य (Face Value) का उपयोग:

ऊपर के उदाहरण को और आगे बढ़ाते है मान लेते है कि ABC Limited कंपनी ने कुछ महीनों बाद अपने शेयर धारकों को 200% Dividend कि घोषणा करती है और बाज़ार में अभी उसके शेयर का मूल्य ₹500 और उसका Face Value ₹10 है।

तो इसका अर्थ यह है कि उसके शेयर धारकों को ABC Limited ₹20 (₹10*200%) प्रति शेयर Dividend देगा। यहाँ 200% Dividend कंपनी के Face Value का माना जाता है।

हमेशा Dividend का Percentage कंपनी के Face Value का Percent होता है, शेयर के मूल्य का Percent नहीं होता।

ऋण-इक्विटी अनुपात (Debt to Equity Ratio)

शेयर या व्यवसाय में निवेश करने के पहले आपको यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि उस व्यवसाय के ऊपर कितना कर्ज या ऋण है। कंपनी के विकाश के लिए उसका ऋण (Debt) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कंपनी के ऊपर यदि आवश्यकता से अधिक ऋण (Debt) है तो उस कंपनी के भविष्य में विकाश करना बहुत ही कठिन होगा। Debt to Equity Ratio (D/E Ratio) हमें कंपनी के ऊपर कितना Debt (कर्ज) है इसकी जानकारी बहुत ही आसानी से प्रदान करता है।

Debt to Equity Ratio हमें यह दर्शाता है कि हमने किसी कंपनी/शेयर में जो भी पैसे निवेश किया है उसके प्रति हमारे ऊपर कितना Debt है। डेब्ट-टू-इक्विटी अनुपात (Debt to Equity Ratio) हमें यह बतलाता है कि कंपनी ने अपने शेयर होल्डर इक्विटी (Share Holder’s Equity) के एक रुपये के ऊपर कितने रुपये का कर्ज (Debt) लिया हुआ है।

यदि किसी कंपनी का Debt to Equity Ratio ज्यादा है तो हम यह कह सकते है कि कंपनी अपने व्यवसाय से अपने कामकाज के लिए Fund नहीं जुटा पा रही है और कंपनी का विकाश (Growth) बाहरी Debt के रुपयों के भरोसे से हो रहा है जो किसी भी कंपनी के लिए अच्छा नहीं है।

कंपनी का Debt to Equity Ratio निम्नलिखित फार्मूला से निकाला जाता है:

Debt to Equity Ratio= कुल देनदारियां (Total Liabilities) / कुल शेयर धारक इक्विटी (Total Equity Shares)

उदाहरण: XYZ Limited एक कंपनी है जिसके पास ₹5 लाख का Short Term Debt है और ₹10 लाख का Long Term Debt है तथा उसकी कुल शेयर धारक इक्विटी (Total Equity Shares) 20 लाख है तो XYZ Limited का Debt to Equity Ratio इस प्रकार होगा

Total Debt (Liabilities)= ₹5 लाख + ₹10 लाख= ₹15 लाख

Debt to Equity Ratio= ₹15 लाख / 20 लाख

Debt to Equity Ratio= 0.75

उपयुक्त उदाहरण से आप यह कह सकते है कि XYX Limited कंपनी के शेयर धारकों के एक रुपये के ऊपर 0.75% या 0.75 पैसे का कर्ज (Debt) है।

एक अच्छा या बुरा Debt to Equity Ratio: Debt to Equity Ratio जितना कम रहता है उसे उतना ही अच्छा माना जाता है। हमें वैसे ही कंपनियों में निवेश करना चाहिये जिनका Debt to Equity Ratio 1 से कम हो। सामान्यता 2 से अधिक Debt to Equity Ratio को बहुत ही ख़राब माना जाता है।

परन्तु कुछ कंपनियों जैसे Banking, Financial में Debt to Equity Ratio अधिक हो सकता है तो इसके लिए हमें उस Industry का Debt to Equity Ratio देखना चाहिये।

कंपनी का Debt to Equity Ratio अधिक होने का मतलब है कि कंपनी के ऊपर अधिक Debt है और यदि किसी भी प्रकार के कारण कंपनी कि वित्तीय परिस्थिति बिगड़ती है और कंपनी को घाटा होता है तो उस कंपनी को अपने Debt के बदले में ब्याज देने में कठिनाई होगी जो कि कंपनी के लिए बिलकुल भी अच्छा नहीं होगा और कंपनी का विकाश रुक सकता है।

लाभांश उपज (Dividend Yield)

कभी-कभी कंपनियाँ अपने वार्षिक Profit का कुछ हिस्सा अपने शेयर धारकों को Dividend (लाभांश) के रूप में देता है। Dividend शेयर धारकों को प्रति शेयर के ऊपर दिया जाता है। उदाहरण के लिए यदि आपके पास ABC कंपनी का 50 शेयर है और कंपनी ₹5 के Dividend का ऐलान करता है तो आपको कुल ₹250 (50 x ₹5)  मिलेगा।

एक कंपनी कितना Dividend देता है इसे स्पष्ट रूप से समझने के लिए Dividend Yield (लाभांश उपज) कि सहायता ली जाती है। Dividend Yield आपको यह दर्शाता है कि कंपनी अपने Current Share के मुकाबले कितना प्रतिशत का Dividend देता है, यह प्रतिशत को वार्षिक समय के अनुसार Calculate किया जाता है।

कुछ निवेशक नियमित रूप से आय (Regularly Income) के वजह से ज्यादा Dividend देने वाले कंपनियों में निवेश करते है। लाभांश उपज या Dividend Yield को निम्नलिखित तरीके से ज्ञात किया जाता है:

Dividend Yield= वार्षिक लाभांश प्रति शेयर (Annual Income Per Share) / मौजूदा शेयर का मूल्य (Current Share प्राइस) * 100

उदाहरण: ABC कंपनी ने अपने प्रति शेयर पर ₹25 का वार्षिक Dividend दिया और ABC कंपनी के शेयर का मूल्य अभी बाज़ार में ₹650 है तो ABC कंपनी का Dividend Yield इस प्रकार होगा।

Dividend Yield= ₹25 / ₹650 *100

Dividend Yield= 3.84%

उपयुक्त उदाहरण से हम यह कह सकते है कि ABC कंपनी के निवेशक को 3.84% का वार्षिक Dividend मिला है।

High/Low Dividend Yield अच्छा या बुरा: ऊपर के उदाहरण से आप यह देख सकते है कि ABC कंपनी का Dividend Yield उसके Current Share Price के हिसाब से निकाला गया है, अतः भविष्य में हो सकता है कि ABC कंपनी का शेयर का मूल्य गिर कर ₹400 हो जाये और तब भी कंपनी ₹25 Dividend देगी इस प्रकार कंपनी का Dividend Yield 3.84% से बढ़ कर 6.25% हो जायेगा। परन्तु शेयर धारकों का शेयर का मूल्य गिर गया है।

इसलिए हमें किसी भी कंपनी में निवेश के पहले Higher Dividend Yield देख कर निवेश नहीं करना चाहिये हमें यह देखना चाहिये कि कंपनी Higher Dividend देती है, या कंपनी का Share Price गिर गया है। जिसके कारण कंपनी का Dividend Yield बढ़ गया।

Dividend देना या ना देना यह निर्णय पूरी तरह से कंपनी के ऊपर निर्भर करता है। हो सकता है कोई कंपनी अपने शेयरधारकों को Dividend नहीं देती है और उसका Dividend Yield काफी Low हो परन्तु इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि कंपनी Profit अपने व्यवसाय के विकास के लिए उपयोग कर रही हो और भविष्य में अपने शेयरधारकों को और भी अधिक Profit अर्जित कर के देगी।

किसी भी कंपनी के शेयर में निवेश के पहले जरुर पढ़े: शेयर खरीदने के पहले उसका विश्लेषण कैसे करें / How to Analyze a Share Before Buying

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