किसी भी कंपनी के स्टॉक में निवेश करने से पहले उसका Fundamental Analysis करना उतना ही जरूरी है जितना की एक वाहन को चलाते हुएँ हमें शीट बेल्ट की आवश्यक होता है। क्योंकि स्टॉक मार्केट में हेरफेर होता है,
जैसा की कोई स्टॉक का प्राइस इतना बढ़ जाता है जबकि उस कंपनी का बिजनेस उतना अच्छा नहीं होता है। इसी हेरफेर (Manipulation) को पम्प और डम्प कहते है इस आर्टिकल में हम कुछ सेक्टर का बुनियादी Fundamental Analysis के रैशीओ को समझेंगे।
Fundamental Analysis of Insurence Company
इस प्रकार की कंपनी का बिजनेस मॉडेल तो अच्छा होता है पर कई बार उनके Claim Settlements जल्दी से नहीं होने से ग्राहक इनके बिजनेस पर आप्ति जताते है। यहाँ जेनरल इनश्योरेंस और लाइफ इनश्योरेंस दोनों की बात कर रहे है, और उनके कुछ मेजर फंडामेंटल रैशीओ की बात करते है।
बीमा-किस्त (Premium)
इनश्योरेंस कंपनी के लिए प्रीमियम ही उसका आय (Revenue) होता है, क्योंकि इस प्रकार की कंपनी अपने ग्राहक से प्रीमियम मासिक, त्रैमासिक और वार्षिक एक निर्धारित मुल्य लेती है। जिससे वह आपकी आवश्यकता पडने पर आपका क्लैम सेटलमेंट कर देता है। प्रीमियम दो प्रकार का होता है
ग्रोस प्रीमियम (Gross Premium)
यह कंपनी के द्वोरा अपने नये प्रीमियम और रिन्यु प्रीमियम का टोटल उसमें से टेक्स को निकाल देने से ग्रोस प्रीमियम कैलकुलेटर होता है। Gross Premium = Customer payments – Taxes
नेट प्रीमियम (Net Premium)
यहाँ कंपनी अपने Premium Received से Reinsurence Premium को निकाल देने से मिलता है। कंपनी खुद के लिए कराये गये इनश्योरेंस को रे-इंसुरेन्स करती है जिससे उस कंपनी का रिस्क मैनेज हो सके।
Net Premium = Premium Received – Reinsurence Premium.
सॉल्वन्सी रैशीओ (Solvency Ratio)
इस रैशीओ से कंपनी के ऊपर जो देनदारी (Liability) उससे वह अपने दीर्घकाल में कैसे मैनेज करता है इसका पता चलता है। क्योंकि एक इनश्योरेंस कंपनी के लिए इस रैशीओ का कम होना अच्छा होता है। इनश्योरेंस रेगुलेटरी और डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (Insurance Regulatory and Development Authority of India) के अनुसार Solvency Ratio 1.5 होना चाहिए।
आप किसी इनश्योरेंस कंपनी का विश्लेषण करते वक्त Solvency Ratio जरूर देखे यह कम से कम 1 या पर्सेन्ट में 100% होना चाहिए। लिक्विडिटी रैशीओ भी आपने सुना होगा पर यहाँ इनमें कुछ असमान्ता है यहाँ लिक्विडिटी रैशीओ एक स्मॉल कंपनी के Cash Flow को शॉर्ट टर्म में निर्धारित करता है।
Cash Flow Statement को समझने के लिए जरूर पढ़े Cash Flow Statement कैसे देखे
Solvency Ratio = (Net Income*Depreciation)/Total Liability
Liquidity Ratio = (Current Assets - Inventory)/Current Liability
Operating Expanse Ratio
किसी भी बिजनेस में उसके एक्स्पेंस कम से कम होना चाहिए जिससे उसके रेविन्यू में वृद्धि हो जिससे कंपनी ज्यादा से ज्यादा ग्रोथ करें। यहाँ भी Operating Expanse Ratio एक इनश्योरेंस कंपनी के लिए जितना कम होगा, उतना ही अच्छा होता है। इसे फाइनैन्स की भाषा में Operating Expanse Ratio से सम्बोधित किया जाता है।
Claim Settlements Ratio
किसी इंसुरेन्स कंपनी को ग्रोथ करने के लिए उसे अपने ग्राहक के द्वोरा किये गये अनुरोध (Claim) को शुचारु करना होता है। इसका मतलब की उस कंपनी के पास एक साल में कितना अनुरोध (Claim) आया और वह उससे कितना जल्दी सेट्टल्ड (settled) किया है। यह रैशीओ का वैल्यू जितना ज्यादा होता है उस कंपनी के ऊपर लोगों का विश्वास भी बढ़ता है। जैसे की पर्सेन्ट में 98-100% होना चाहिए।
Claim Settlement Ratio = (Claim Settled / Total Claim)*100
Fundamental Analysis of Information Technology
यह सेक्टर विते हुए कुछ सालों में भी बहुत अच्छा प्रदर्सन करता रहा है, भारत में जो इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सेक्टर वाली कंपनीयाँ है। इस तरह की कंपनी अपना कोई प्रोडक्ट सेल नहीं करती है, इनका बिजनेस दूसरे कंपनी को सर्विस प्रदान करना है।
यह अपने कस्टमर को सिस्टमैटिक डाटा, नेटवर्क और टेक्नॉलजी आदि को उपलब्द करती है। यहाँ उनके कुछ प्रमुख Fundamental को देखेंगे, यहाँ हम इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सेक्टर की चार मुख्य फंडामेंटल के बारे में जानेगें।
New Client
इस प्रकार की कंपनी के क्लाइंट वार्षिक बढ़ते रहने चाहिए और कंपनी से वह क्लाइंट लम्बे समय जुड़े रहने चाहिए। अगर उनके क्लाइंट जो पुराने हो या नये जो इनसे सर्विस लेना बंद करने से कंपनी के आय (Revenue) पर सीधा असर होता है। यहाँ कंपनी के क्लाइंट अनुक्रमानुपाती (Directly Proportional) होता है उनके रेविन्यू के साथ जो किसी इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी कंपनी के लिए अच्छा होता है।
Total Contract Value
इस रैशीओ को सिम्पल भाषा में बोला जाए तो कंपनी का मासिक रेक्कुरिंग रेविन्यू को उसके कान्टैक्ट के अवधि (Duration) (मासिक या तिमाही) के साथ एक बार में भुक्तान किया गया अमाउन्ट होता है। अगर किसी आईटी कंपनी का यह रैशीओ तिमाही बड़ रहा है तो वह कंपनी अपने बिजनेस में ग्रोथ करेगी। यह रैशीओ लगातार (Consistently) बढ़ता रहना चाहिए जिससे कंपनी के आय भी बढ़ती रहती है।
Total Contract Value = Monthly recurring Revenue * Duration of Contract (in Month) + One time fees.
Constant Currency Growth
जब कोई कंपनी अपने सर्विस को विदेशों में उपलब्द करवाती है तो उसका भुगतान भी डॉलर ($) में होता है जिससे करेंसी में Fluctuation होता है। अगर भारतीय करेंसी उस देश के करेंसी से ज्यादा या कम हो सकती है जिससे कंपनी के Constant Currency Growth के साथ साथ अपने आय को भी प्रभावित करती है। जिस कंपनी का Constant Currency Growth वर्ष दर वर्ष बड़ता है उसमें निवेश करना सकरात्मक तरीके से सही होता है।
Attrition Rate
यहाँ Attrition Rate IT कंपनी के प्रतिष्ठा (Reputation) को बताता है क्योंकि अगर आईटी कंपनी का Attrition Rate ज़्यादा होता है तो इसका मतलब उसके कर्मचारी कंपनी से खुश नहीं है और उसे छोड़ देते है। जिससे उस कंपनी को न्यू हाइरिंग करनी होती है जिससे उस कंपनी का समय और पैसा भी लगता है। यह रेट किसी भी आईटी कंपनी के लिए जितना कम होता है उतना ही बेहतर होगा।
Fundamental Analysis of Banking Sector
यह सेक्टर सभी निवेशको का पसंदीदा (Favorite) रहा है जो की अपने निवेश को अच्छा रिटर्न देता आ रहा है। किसी भी Stock का Fundamental Analysis करने से उसके बुनियादी बिजनेस के बारे में पता चलता है। आज कल सभी को अपने पैसे को सुरक्षित रखने और उस पैसे से रिटर्न लेने के लिए बैंक एक अच्छा विकल्प होता है। इस सेक्टर का मुख्य आय अपने ग्राहक को दिए गये ऋृण (Loan) से मिलने वाला ब्याज होता है।
Net Interest Income
यह रैशीओ बैंक के द्वोरा अपने ग्राहक को दिये गये ऋृण पर प्राप्त ब्याज आय बताता है। बैंक अपने अकाउंट होल्डर को ऋृण देता है तो उस पर उन्नसे ब्याज लेता है और अगर सैविंग अकाउंट में रखे हुए पैसे पर हमें बैंकब्याज देता है। यहाँ समझने वाली बात यह की सैविंग अकाउंट में जो ब्याज बैंक देता है,
उससे डबल वह अपने ऋृण ग्राहक से चार्ज करता है।आप जिस भी बैंक का Fundamental Analysis कर रहे होंगे उसका Net Interest Income ज्यादा होनी चाहिए जिससे बैंक अपने बिजनेस को बढ़ा (Expend) सके।
Net Interest Income = Loan Interest - saving Account Interest to Customer
Net Interest Margine
इस रैशीओ को बैंक अपने तिमाही (Quater) परिणाम में बतायाँ करते है जिससे उसके स्थाई सिद्धातों का पता चलता है।अगर कोई बैंक कम व्याज पर ऋृण दे रहा है या अपने ग्राहक के सैविंग अकाउंट में ज्यादा व्याज दे रहा है। इसका साबद्धिक अर्थ होगा की बैंक अपने बिजनेस को सकारात्मक तरीके से बढ़ाना चाहता है। यह रैशीओ बैंक के तिमाही परिणाम में बढ़ता जा रहा है तो उस बैंक के लिए एक गिरावट (Decline) Fundamental Analysis बताता है क्योंकि यह तिमाही समान रहना चाहिए।
Net Interest Margine = Net Interest Income / Income Earing Assets (Not in NNPA)
Non Performing Assets
इस रैशीओ से बैंक के द्वोरा दिए गये लोन पर वह कितना प्रतिशत का रिटर्न एक साल में बनाता है। जैसा की कोई बैंक मार्केट में 20Cr. का लोन दिया है जिससे वह एक साल में कितना व्याज प्राप्त करता है, यह रैशीओ की घोषित (Declared) साल में एक बार ही की जाती है। यह दो प्रकार के होते है पहला Gross NPA दूसरा Net NPA जिनको नीचे विस्तार से देखते है।
Gross Non Performing Assets
यह रैशीओ से बैंक के Not Paid उधार (Borrowing) का पता चलता है। किसी बैंक का कुल उधार से चुकाया गया पैसा को निकाल देने से Gross Non Performing Assets पता चलता है। जैसा की 20 cr. से बैंक को कुल प्राप्त 15 cr. हुआ तो कुल 20 Cr. से 15 Cr. और उसपे व्याज निकाल देने से Gross Non Performing Assets पता चलेगा।
Net Non Performing Assets
जब किसी बैंक को उसके उधार का कुछ पैसा नहीं मिलता तो उन्हे एक अनुमान लगाना होता है की कुल उधारी से और कितना रिकवर हो सकता है। उसके बाद बैंक उस पैसे को Provision of bad Loan की वर्ग में डाल देते है। यह प्रक्रिया 90 दिन के बाद अगर ग्राहक पेमेंट नहीं करता है तो उसके बाद ही स्पष्ट किया जाता है।
Net Non Performing Assets = Gross NPA - Provision
Capital Adequacy Ratio
इसे पूंजी पर्याप्तता अनुपात कहते है जो बैंक के कैपिटल के साथ उसके रिस्क को समझाता है। इस रैशीओ के बढ़ने से बैंक का Adequacy Growth होता है, क्योंकि बैंक के अपने रिस्क को कम करते हुए अपने कैपिटल को सुरक्षित रखता है। इस रैशीओ का 12% से कम होना एक बैंक के लिए अच्छा माना जाता है और 1% से अधिक होना चाहिए।
Capital Adequancy Ratio = (Tire1 + Tire 2 capital)/ Risk Weighted Assets
Fundamental Analysis of Cement Industries
यह सेक्टर भारत के भूमिकारूप व्यवस्था (Infrastructure) को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है, पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में बढ़ी तेजी आई है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ी मात्रा में सिमेन्ट उत्पादन करने वाला देश है, जो कि लगभग 200+ मिलियन टन एक साल में उत्पादन करता है। यह सेक्टर का देश में ग्रोथ का 1.2X योगदान (Contribution) है। इस सेक्टर के कुछ मूल विश्लेषण के बारे में बात करते है जिसको आप अपने Fundamental Analysis करते समय ध्यान देने की आवश्यकता है।
Operating Profit Margin
यह सिमेन्ट इंडस्ट्री के लिए उसके व्याज या टैक्स चुकाने के पहले जो प्रॉफ़िट होता है उसे इसके नेट सेल से विभाजित करने से मिलता है। यह उस कंपनी के कच्चे माल और कर्मचारी (Employees) के वेतन को निकाल देने के बाद पर सरकार को टैक्स देने से पहले का होता है। यह रैशीओ कंपनी के प्रदर्शन और प्रचालन को दर्शाता है इसका अनुपात या प्रतिशत उच्चतर होना चाहिए।
Operating Profit Margin = (Operating Profit / Net Sales) x 100 %
Earning Per Share
यह रैशीओ आपको कंपनी के द्वोरा कितने शेयर जारी (Issued) किए गए और उस पर कंपनी को कितना रिटर्न मिलता है। इस रिटर्न को वार्षिक हिसाब किया जाता है जैसा की एक सिमेन्ट कंपनी का मार्केट में 200 cr. शेयर है। जिस पर उसका एक वर्ष उस शेयर का मुल्य 5% बढ़ता है इसका मतलब आपको उस शेयर में 5% लाभ मिलेगा। Earning Per Share (EPS) दो प्रकार का होता है
- Basic EPS
- Diluted EPS
Earning Per Share = (Profit After Tax - Perference Dividend) / No. of Equity Share
Net Profit Margin
रीटेल निवेशक को स्टॉक मार्केट में निवेश करने से पहले उस सेक्टर का फंडामेंटल एनलेसिस करना चाहिए , और उस समय कुछ और रैशीओ पर भी ध्यान देना चाहिए जो सभी सेक्टर में देखने को मिलता है। नेट प्रॉफ़िट मार्जिन उस कंपनी के कुल आय को सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खर्चा को निकालने के बाद जो प्रॉफ़िट मिलता है, उसे Net Profit Margin कहते है। जैसे की कोई एक कंपनी अपने कुल बिकवाली से कुल खरीद के मुल्य और कुल खर्च को निकालने से बचा मुल्य को नेट प्रॉफ़िट मार्जिन कहते है।
Net Profit Margin = (Net Profit / Net Sales) X 100
Return On Net Worth
यह रैशीओ शेयर होल्डर को उस कंपनी के सभी प्रकार के Expanse और Liabilities को घटाने से मिलता है जिसे Return On Net Worth कहते है। यह रैशीओ जितना कम होता है इसका मतलब कंपनी अपने प्रॉफ़िट को बढ़ाने के साथ-साथ अपना Liabilities कम कर रही है।
और यह एक अच्छा महत्वपूर्ण (Significant) संकेत होता है क्योंकि जिस भी कंपनी का Return On Net Worth बढ़ता है या स्थिर होता है उस कंपनी का फंडामेंटल अच्छा है। इस रैशीओ का तुलना (Comparison) दूसरे सिमेन्ट कंपनी के साथ करने से आपको एक अच्छा पूर्णता (Perfection) होगा।
Return On Net Worth = (Net Profit x 100) / (Equity ShareCapital + Reserve & Surplus)
Current Ratio
यह रैशीओ उस कंपनी के तरलता की स्थिति (Liquidity Position) को साधारण भाषा में बताती है। इस का मतलब कंपनी अपने Liabilities को चुकाने में कितनी सक्षम है क्योंकि जिस कंपनी का करेन्ट रैशीओ बढ़ता है वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार उसे अच्छा नहीं माना जाता है। यह रैशीओ 1 से 2 % होना चाहिए, यह 1 से कम भी नहीं होना चाहिए और 2-3 से ज्यादा भी नहीं होना चाहिए।
Current Ratio = (Current Assets/ Current Liabilities)
Fundamental Analysis of Automobiles Sector
यह सेक्टर भारत का लोकप्रिय बिजनेस सेक्टर है, इस में कुछ वर्षों से बहुत तेजी देखने को मिल रही है। जब से इलेक्ट्रिक वाहन (Electric Vehical) को सरकार ने प्रोहीत शाहित किया है यह सेक्टर साल दर साल एक नहीं ऊँचाई को छु रहा है। आप को पता होना चाहिए की कोई भी Automobiles कंपनी अपना कुल वाहन के पुर्जे को खुद उत्पादन नहीं करती है।
क्योंकि एक वाहन का लगभग 2-3 हजार पुर्जे होते है जिसमें नट और बोल्ट (Nut & Bolt) भी सामिल है। आज कल जो वाहन मार्केट में आ रही है उसमें Electronic Sensor, Bluetooth, Phone charging Ports और भी बहुत कुछ Software मवजूद कराये जाते है। कंपनी अपने उपविक्रेता (Sub vendor) से कुछ पुर्जे अपने डिजाइन के अनुसार खरीद लेती है। इसके कुछ Fundamental को सबसे साधारण भाषा में समझते है
Production Volume
इस रैशीओ को किसी भी ऑटोमोबाइल कंपनी के लिए अपने प्रस्तुति रिपोर्ट (Presentation Report) के तिमाही या छमाही महीने में सामिल करना होता है। इसमें अगर एक अतिरिक्त ग्रोथ होता है तो कंपनी अपने उत्पादन परिमाण को स्थिर (Consistency) उत्पादन कर रही है पर अगर इसमें किसी तिमाही में सीधा वृद्धि या हानि है तो उस समय कंपनी एक नोट लिखती है अपने प्रस्तुति रिपोर्ट में जिसमें उसने उसका कारण सामिल किया होता है जिस कारण वह उत्पादन को प्राप्त (Achieve) नहीं कर सकें।
Sales Volume
ऑटोमोबाइल सेक्टरों का Fundamental Analysis करते समय सेल्स रैशीओ को देखना बहुत जरूरी होता है। यह रैशीओ हमें उस कंपनी के द्वोरा मासिक सेल्स वॉल्यूम को दर्शाता है, जब कोई ऑटोमोबाइल कंपनी प्रोडक्सन वॉल्यूम के साथ-साथ उसके सेल्स वॉल्यूम भी को भी संभालती है।
क्योंकि Manufacturing और Assembly लाइन तो 24X7 चलती रही है और प्रोडक्सन भी होता रहता है। अगर वाहन सेल नहीं होगी, तो उसके बिजनेस ग्रोथ पर असर पड़ता है। इसकी सेल्स वॉल्यूम की तुलना उसके प्रोडक्सन वॉल्यूम के साथ करने से आपको स्पष्टता होगी, की वह कंपनी इन दोनों रैशीओ को कितनी कॉनसिस्टेनसी के साथ मैन्टैन करती है।
Revenue Growth V/S Volume Growth
इन सभी रैशीओ को आप लोग ऑटोमोबाइल कंपनी के तिमाही रिपोर्ट से एकत्र करना होगा। इस रैशीओ से उस कंपनी के रेविन्यू ग्रोथ की वृद्धि उसके वॉल्यूम ग्रोथ से ज्यादा होनी चाहिए। क्योंकि कोई भी ऑटोमोबाइल कंपनी अपना वॉल्यूम ग्रोथ तो बढ़ा लेते है पर उनका रेविन्यू ग्रोथ स्थिर रहता है।
जब तक ऑटोमोबाइल कंपनी के रेविन्यू ग्रोथ में वृद्धि नहीं होती है, तो वह अपने बिजनेस को विस्तृत (Expand) नहीं कर सकता है। इसी लिए Fundamental Analysis करते समय कंपनी के रेविन्यू ग्रोथ v/s वॉल्यूम ग्रोथ (Revenue Growth V/S Volume Growth) को तुलना करना आवश्यक होता है।
अगर इन दोनों रैशीओ में वृद्धि हो रही है, तो उस कंपनी में निवेश करना सही होता है पर इसके अलावा भी और रैशीओ है जिनको देखना आपके लिए अनिवार्य है। कंपनी के Cash flow को भी देखना होता है एक अच्छे Fundamental Analysis करने के लिए आपको Operating Cash flow, Investing Cash flow और Net Cash flow देखना होता है।
After Sales Service
यह रैशीओ उस कंपनी के सेल किये गये वाहन का रखरखाव (Maintenance) कितने दिनों तक करेगी इसका वेवर रहता है।कुछ ऑटोमोबाइल कंपनी का भारत में सर्विस सेंटर बहुत कम है जिसके कारण उसका सेल वॉल्यूम भी कम होता है।
क्योंकि कोई भी प्रोडक्ट के सेल करने के साथ-साथ उसका आफ्टर सेल्स सर्विस भी आवश्यक होता है। इसका सीधा असर उसके सेल वॉल्यूम को बढ़ाता है। इसी करण यह रैशीओ इम्पॉर्टेन्स हो जाता है।